क्या रानी रूपमती दाल बाफला खाती होंगी?
यह सवाल हमारे मन में मांडू भ्रमण के दौरान उठा।
वैसे तो मित्र की बेटी की शादी में भोपाल आये थे ,
लेकिन वहां से उज्जैन ,मांडू, माहेश्वर और उज्जैन (मालवा क्षेत्र ) का भी प्रोग्राम बन गया।
४० साल पहले बैंक की ट्रेनिंग में मांडू का एक दिन का ट्रिप लगा था।
यादें धुँधली पड़ रहीं थीं ,रानी रूपमती और मालवा के आखिरी आज़ाद बादशाह बाज़ बहादुर की रूमानी कहानी याद थी।
कवि रूपमती संगीत निपुण थीं और किवदंतियों की मुताबिक चरवाहा/गड़रिया समुदाय की थीं ,
जहाज़ महल,हिंडोला महल और रानी रूपमती का महल,
जिसे रानी रूपमती के नर्मदा दर्शन को सुलभ बनाने के लिए बाजबहादुर ने ऊँचाई पर बनवाया था
यहाँ से अब नर्मदा नदी तो नज़र नहीं आती ,
शायद इसका बाद में पुरानी सैनिक छावनी की तरह भी उपयोग होता होगा।
पुरातत्व विभाग की बदौलत सारी विरासत -इमारतें और बाग़ अच्छी हालत में दिखे।
शहर के हर मोड़ पर,हर महल के गेट पर उपले /कंडे पर बाफले सिंकते दिखे ,
जिसके साथ मूंग अरहर की मिली जुली दाल भी मिल रही थी।
लोगों ने बताया कि यह मूलतः भील समुदाय का भोजन है
देखने में दाल बाटी की तरह दिखते हैं,पर पहले भाप में पकाने से मुलायम होते हैं ,दाल बाटी की बनिस्बत
मालवा पुराने तिज़ारती मार्गों के केंद्र में था ,
इसके भोजन पर गुजराती,राजस्थानी और मराठी पाक पद्धति का प्रभाव दिखता है
इसके पहले कि हम लोग सड़क किनारे दाल बाफले जीमें ,
मांडू के सरकारी मालवा रिसॉर्ट के मैनेजर साहब ने होटल में ही लंच में गरमा गरम परोस दिया
ताज़ी हरी चटनी , पंच मेल की दाल और घी में डूबे दाल बाफले
वैसे तो मालवा का भोजन जग प्रसिद्ध है ,पर यह स्वाद याद रहेगा
मांडू की यात्रा सफल हुई

