Friday, September 18, 2020

बीजापुर की खानावली  


   




हम्पी दर्शन के बाद बीजापुर का गोल गुम्बज़  देखा गया 

आदिल शाही सुल्तान के काल की ईमारत में द्रविड़ और इस्लामी शैलियों का संगम है 

घुमावदार सीढ़ियों से चल कर छत तक चढ़ने उतरने के बाद सबको भूख लग आयी थी 


ड्राइवर साहब टूरिस्टों में मशहूर होटलों तक ले गए 

पर बात जमी नहीं ,शाही पनीर और तंदूरी रोटी खाने हम थोड़े ही बीजापुर आए  थे 

पूछ ताछ का फ़ायदा हुआ ,उत्तर कर्नाटक के भोजन की तलाश गलियों में शुरू हुई 

किसी भले मानुस ने खानावली  का पता बताया

पता चला कि घर की महिलाओं द्वारा चलायी जाने वाली मेस की परम्परा इस क्षेत्र में है 

महीने भर का दो टाइम का भोजन विद्यार्थियों को सुलभ कराया जाता था,

गृहस्वामिनी द्वारा ,वाज़िब कीमत पर 

बम्बई में मिल के मज़दूर भी इस प्रणाली के शुक्रगुज़ार रहें हैं 

लुढ़कते  पड़कते हम भी बीजापुर की खानावली  माई के घर पहुँच गए 

एक कमरे के ठौर ठिकाने में छोटी सी रसोई में चूल्हे पर तवा चढ़ा था 

पास में दो तीन बटलोई /भगोने नज़र आये 

डर लगा कि आज भर पेट खाना मिलेगा भी या नहीं. 

पर एक बार स्टील की थालियां पंगत में लगी,तो दिल खुश हो गया 

ज्वार की जोलडा रोटी तवे से उतर रही थी 

साथ में मेथी वाली अंकुरित हरी मूंग दाल

और भरवां बैंगन की उत्तर कर्णाटक शैली की सब्जी थी 

मसाला थोड़ा तेज था ,कोपरा ,मूंगफली और तिल और बैडगी  मिर्चो का मिश्रण था 

इस इलाके की ख़ास चटनी पॉवडर -शेंगा पुडी भी थाली में परसी गयी 

मूंगफली और मिर्चों को पीस कर बनायीं  लगती थी 

एक भगोने से गरमा गरम चावल भी निकला 

मेथी का हरा साग और देसी प्याज सलाद की पूर्ति करते थे 

बिटिया रानी को घर की जमाई सजाव दही खूब भाई 

दादाजी भी खुश थे इस अनुभव से 

अभी एक अचरज बाकी था 

चार लोगों के भोजन का बिल साथ की दुकान से मंगाई गयी 

बिसलेरी की बोतलों के बिल से भी कम था 

आदर से सर  झुक गया बीजापुर की खानावली   माई की दस्तक पर 

इतने साल बाद भी स्वाद ताज़ा है 

चित्र साभार 

Monday, April 6, 2020

जॉर्जिया में खचापुरी

जॉर्जिया में खचापुरी 




बॉस ने कहा था कि जॉर्जिया में किसी  विश्वस्तरीय सम्मलेन में भाग लेना पड़ेगा 
इसमें दो मुश्किलें थीं 
दिवाली का त्यौहार अगले दिन था 
और मुझे मालूम नहीं था कि दुनिया के नक्शें में जॉर्जिया कहाँ है 
रास्ता कहाँ से है 
गूगल महोदय ने जॉर्जिया को पुराने सोवियत रूस का अंग और
 Armenia   और तुर्की के पास बताकर रास्ता दिखा दिया
दिल्ली से दुबई और वहां से चार घंटे आगे 
उसकी राजधानी तब्लिसि (Tbilisi )  तक पहुंचा जा सकता था 

बिटिया रानी बोलीं ,मैं भी चलूंगी 
उनके नानाजी की तबियत नासाज होने की वजह से संगिनी का जाना मुनासिब नहीं था 
तो चल पड़े  बाप बेटी जॉर्जिया की सैर पर 
तब्लिसि शहर पुराने सोवियत रूस की भव्य इमारतों और संग्रहालयों से भरा पड़ा था 
बाल्कन पर्वतों के पास बीच बसा  रमणीय शहर लग रहा था 
लोहे का बना पुल तब्लिसि के दो हिस्सों की मध्य रेखा की तरह था 
नए यूरोप और पुराने रूस का मिला जुला नज़ारा था 
तब्लिसि का  बाज़ार फलों और मसालों से पटा था 
कई तरह के  सेब,आड़ू ,बेर और आलूबुखारे नज़र आये 
 फलों के साथ अखरोट की शक्कर में पगी लड़ी churchkhela  लटकी थी 
तंदूरी नान जैसी रोटियां मिलती थी 
घर घर में wine ढालने की परंपरा थी 
चीज़ की भी कई किस्में मिल रहीं थी 

क्रिस्चियन बहुल देश होने के कारण खाने में सामिष व्यंजनों की भर मार थी 
शहर की मुख्य सड़क का नाम मध्य कालीन देश कवि शोता रुस्तवाली के नाम पर रखा है,
देख दिल को खुशी मिली 
ख़ुशी स्थानीय डिश  खचापुरी 
खाकर भी हुई 
नाव की तरह की नान जैसी रोटी में पिघलती   चीज़ भरी थी 
आज तक स्वाद याद है

चित्र  साभार