Tuesday, April 1, 2025

 भूले बिसरे ज़ायके 




हाल में Scroll में ग़ज़ाला जमील  के लेख में सेमल गद्दे /दोड्डे की भूलती सब्जी ने 

यादों की खिड़कियां खोल दीं। 

ग़ज़ाला जी ने लिखा है कि वे सब्जियां/फल  जो बटोरे जाते थे। 

जैसे गूलर ,बढल, जंगल जलेबी,खिरनी,

जिनका बाज़ार के बदलते समीकरण से राबता नहीं बन पाया। 

उनकी सब्जियों के ज़ायके लुप्त होते जा रहें हैं। 

ये वे फल/साग/तरकारी थे ,

जिनको जंगलात /खेत की पगडंडियों  से चुना/बीना  जाता था। 

सूखे की मार पड़ने पर या मुश्किल दिनों में काम आते थे ,

बटलोई चढाने के काम में। 

पूर्वांचल में बिताये दिनों में खायी कई फल/साग  ,

दक्षिण भारत के सुपर मार्किट /बाज़ारों में अनुपलब्ध हैं। 

क्या पता अब इन सब्जियों के स्वाद अब नयी पीढ़ी को रास आतें है कि  नहीं। 

मुझे गूलर ((Ficus racemosa)) के फल की मसालेदार सब्जी बहुत पसंद थी 

गूलर और अंजीर एक ही परिवार के सदस्य है ,

गूलर उपेक्षित ,बेरोजगार रिश्तेदार है ,सड़क पर गिरा पड़ा मिलता है 

जनता जनार्दन को रास आता है 

अंजीर  धुल कर चमका कर,प्लास्टिक पैकिंग में . 

सुपर मार्किट की शेल्फ पर विराजमान रहता है .

मुझे बचपन के दिनों में काफी पसंद था ,

सनई का साग /सन का साग/पट /पटुआ का शाक .

पूर्वी उत्तर प्रदेश ,बिहार ,झारखण्ड में  बनता है 

 सनई के फूलों को तोड़कर,कच्चे मसाले में पकी सब्जी का स्वाद बेमिसाल है 

सनई का पौधा पटसन के परिवार का है ,रस्सी बनाए में भी काम आता है 

एक और ज़ायका जो याद आता है, अरहर की दाल की चुन्नी की लिट्टी का 

जिन दिनों अरहर को दाल के लिए हाथ से दरा जाता था ,तब टूटे हुए दानो को आटे में मिला कर आग पर पकती  थी लिट्टी 

खुरदुरी,सोंधी पर लाज़बाब 

गांव ,जौहार के भूले हुए स्वाद ,जो अब लुप्त हो रहें हैं 

जाने कहाँ गए वह दिन