Friday, June 6, 2008

मिड डे मील का अंक गणित


भोजन भट्ट के ढाबा पुराण से इतर पंजाब की सच्चाई कुछ और भी है

जी .टी. रोड पर लुधियाना

के पास खन्ना एशिया की सबसे बड़ी धान की मंडी है

मंडी के चारो और FCI की सरकारी खरीद के धन के बोरे खुले मे पड़े है

सड़ने के लिए
कहीं तिरपाल से ढंकने की रस्म अदायगी करने की कोशिश दिखती है

यही हाल पूरी जी. टी रोड के किनारे बने कच्चे गोदामों का है,

हरियाणा में भी यही स्थिति दिखती है

सरकारी खरीद का दस % हिस्सा इस तरह जाया हो जाता है

ऐसे देश में जहाँ भुखमरी से अभी तक निजात नहीं मिली है ,

बाल कुपोषण के आंकडे अपनी कहानी बताते हैं

unicef का कहना है कि दुनिया में आधी से ज्यादा बच्चों की मौतें भूख और कुपोषण से होंती है

इसमे मे भी अपना मुल्क लीडर है

हाल ही में जारी राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण ( एनएफएचएस -3 ) के हवाले से

तीन साल से कम उम्र के 45.9 प्रतिशत से ज़्यादा बच्चे underweight हैं

पाँच साल से ज्यादा उम्र के करीबन ६००० बच्चे हर दिन भुखमरी और कुपोषण से मरते हैं

दुनिया के 146 करोड़ अल्पपोषित बच्चों के एक तिहाई 57 करोड़ अपने देश में हैं

बच्चों के खाली पेट विद्यालय जाने का दुःख बयान करने की जरुरत नहीं

ऐसे में इस बात पर बहस नहीं हो सकती कि

दोपहर के भोजन अगर शाला परिसर में ही मिले

तो दुखियारे माँ बाप के अपने बच्चों को सुबह स्कूल जाने के लिये

राजी करना आसान होगा .
.
कहने को तो १९९५ में ही मिड डे भोजन की योजना कागजों पर शुरू हो गई थी

लेकिन २००१ में सर्वोच्च न्यायालय को मजबूरी में हुकुम देना पद

कि हर स्कूली बच्चे को पकाया हुआ खाना शाला में मिलना होगा

बहुत सारी राज्य सरकारें इसके बदले 'सूखा अनाज ' बच्चों में बाँटती थीं

जो अक्सर बच्चों के घर पहुँचने से पहले बस्ते से गिर जाता था

जहाँ मिड डे भोजन मिलता भी था

वहाँ से सडा/बासी खाना मिलने की शिकायतें मिलीं थीं

सुधार की बजाय सुनने मे आ रहा है

दिल्ली में यह बहस जोरों से चल रही है कि

गर्मागर्म पकाए खाने की सांसत में पड़ने की जगह बिस्कुट के पैकेट बच्चों में बांटे जाएं

जरुर बिस्कुट बनने वाली कम्पनियाँ खुश होंगी

कवि ने जब लिखा था कि

भूख लगी है तो सब्र कर, रोटी नही.तो क्या हुआ

आजकल दिल्ली में है जेरे -बहस ये मुद्दा

उन्हें पता नही था कि चालीस साल में इतनी प्रगति होगी

आगे रोटी बनाम बिस्कुट की बहस चलेगी

अगली कड़ी में -

'भूख का अर्थशास्त्र '

No comments: