
नया साल मुबारक हो
सबकी थाली में खाना हो
हर रसोई में चूल्हा जलता रहे
किसी की जेब खाली न हो
खुशी और पकवान सबके नसीब में हो
इसी चाहत के साथ
भोजन भट्ट
तीसरा आदमी कौन है
जो नारियल पानी बम्बई में १५-२० रुपये में इस साल बिक रहा है उसके लिए किसान को फी नारियल दो रुपये भी नही मिलते
मंड्या (मैसूर के पास कर्णाटक में) जिले से पूरे भारत भर में हरे नारियल भेजे जाते हैं
वहां के किसान बताते हैं कि उन्हें २.५० रुपये से ज़्यादा एक नारियल के लिए कभी नहीं मिलते
गेहूं की कीमत मंडी में १००० रुपये क्विंटल नहीं मिलती
(बशर्ते किसान के पास इतनी क्षमता हो कि वह उसे मंडी तक लाकर बेच सके )
बंगलोर में आटा २९-३१ रुपये किलो बिक रहा है
आटे की पिसाई २ रुपये किलो से ज्यादा तो नही लगती होगी
पैकिंग और यातायात की लागत इतनी तो नही हो सकती
इस साल सेब १२०-१३५ रुपये किलो बड़े शहरों में बिक रहे हैं
हिमाचल और कश्मीर के उत्पादकों को क्या कीमत मिलती है ,पता कर लीजिये
कुछ साल पहले भण्डारण और ट्रांसपोर्ट के अभाव में हिमाचल के अनदुरुनी जिलों में आलू और सेब को एक भाव बिकते और न बिक पाने पर सड़ते देखा है
कल शाम जामुन बिकती दिखी ,दाम पूछा-१०० रुपये किलो
हमारे गाँव में क्या कीमत मिलती है बताने में भी शर्म आती है
तो क्या वजह है कि उपभोक्ता को जो खाद्य पदार्थ इतनी ऊँची कीमतों पर मिलते हैं ,उत्पादक किसान लागत भी नहीं निकल पाने के कारन आत्म हत्या करने पर मजबूर है
अब समय आ गया है कि उस आदमी की पहचान कर ली जाए जो न रोटी बेलता है न रोटी खाता है पर जिसकी वजह से आम आदमी को बढती कीमतों से जूझना पड़ता है
प साइनाथ अपनी मशहूर किताब ' Every one loves a good drought 'में तमिलनाडू के रामनाड जिले के मिर्ची उत्पादकों की वहां की मंडी के कमीशन एजेंटों (थारागर) के हाथ लुटने की कहानी बयान करते हैं
बिचौलिए तौलिये के अन्दर उँगलियों की गुप्त भाषा में मिर्ची की कीमत और किसानों की जिंदगी की कीमत तय करते हैं ,खरीदार और किसान इस पूरी प्रक्रिया से बाहर है
कुल ७० कमीशन एजेंटों द्वारा पूरे तमिलनाडू के किसानों की किस्मत का फैसला होता है
गाँव के पास की मंडी में रामधन के बैल बेचने की कहानी प्रेमचंद के ज़माने से नही बदली है
दलालों ,बिचौलियों,एजेंटों के हाथ जिंदगानी पिस रही है
दिल्ली की आजादपुर मंडी के मालिक तय करते हैं कि हिमाचल और कश्मीर के किसानों के घर कितने दिन चूल्हा जलेगा
अजीब मकड़ जाल है यह
(इन्कम टैक्स विभाग के मित्र जब एक केला व्यापारी के यहाँ गए तो भव्यता देख कर दंग थे ,तीन मंजिली airconditioned आरामगाह में घर के अन्दर लिफ्ट लगी थी ,हर मंजिल पर जाने के लिए)
लीची के व्यापार पर शोध करने वाले बताते हैं
'The Pre-Harvest Contractor or the commission agent makes the maximum margin in litchi marketing, as he only performs a transfer function without involving any other cost. The stockists in litchi sale adopt the undercover system and realise higher margins. The retailers are the second market intermediaries who realise a margin of 20 per cent in the consumers price. The overall price spread in litchi trade is observed to be around Rs 49.5 per kg and works out to over 82 per cent. In case the grower undertakes self- marketing, the price spread is approximately Rs 40 per kg. '
८२% मुनाफा !तभी तो लीची खाना अब सबके बस की बात नहीं
कुछ सालों में नारियल पानी भी साझे में पीना पड़ेगा
अगर तीसरे आदमी का साम्राज्य यूँ ही फैलता रहा
चित्र और आंकड़े साभार
कटिंग चाय -मजबूरी में
इसका स्वाद मुंबई वालों के लिए तो आम बात होंगी
पर वन - बाई टू काफी पीने का मौका बंगलोर आकर ही मिला
सधे हाथों से स्टील के ग्लास में पहले गाढा द्रव्य (काफी decoction)डालते हैं फ़िर एक कप दूध+पानी+चीनी के उबलते पेय को दोनों ग्लास में बाँट देते हैं
शुरू में लगता था क्या अजीब शगल है
बाद में लगा कि ये बढती कीमतों से जूझने का एक तरीका है
लेकिन हाल की सर से ऊपर भागती महंगाई के चलते ये काफ़ी भी अब बहुतों को नसीब नहीं है
पूरे दक्षिण भारत में बिना फिल्टर काफी के दिन की शुरुआत नही होती
कामकाजी/मजदूर नुक्कड़ की काफी कढाई/ठेले पर पीते हैं
होटल वाले इडली डोसा के साथ काफी का दाम भी बढ़ाने को मजबूर हैं
काफी हर शख्स पीता है पर बढ़ा हुआ दाम देने में असमर्थ है
होटल वाले आधे कप का तीन चौथाई भर कर उसी कीमत पर बेच रहें हैं
कई लोग दूध कम कर पानी बढ़ा रहें हैं
बिहार में लालू यादव की लोकप्रियता में भले कमी न हुई हो
समोसे के अन्दर भरे आलू मिश्रण में भारी कमी हुई है
बेकरी वाले puff के अन्दर भरा सब्जियों का मसाला कम कर रहे हैं
भोजन भट्ट का परिवार हाल में डोसा खाने गया तो डोसे की साइज़ देख कर दंग रह गया
थाली की साइज़ का डोसा सिमट कर तश्तरी के आकार का रह गया था
दूसरा डोसा ऑर्डर करने की गुंजाईश नही थी सो आधे पेट मन मसोसना पड़ा
दुनिया की दो तिहाई आबादी खाने की बढती कीमतों से जूझ रही है
पर बच्चों को भी इसका खामियाजा भुगतना पड़ रहा है
पहले मिड डे भोजन में मेनू हर दिन बदलता था
खारा पोंगल /रोटी सब्जी / चावल साम्भर/ बिसे बिले भात /उपमा मिलती थी
हर डिश में सब्जियां लगती हैं
सब्जियां अब सबको नसीब नहीं
२.३२ रुपये फी बच्चे में शाला विकास प्रबंधन समितियां सब्जियां जुगाड़ने में असमर्थ हैं
नतीजन बच्चों के खाने से सब्जियों की कटौती हो रही है
बड़ी कम्पनियाँ चालाकी अपना रहीं हैं
५०० ग्राम चाय के पैकेट में ४९० ग्राम चाय मिलती है
सो कटिंग चाय भी अब सबको मयस्सर नहीं
बिहारी व्यंजन
आज कल तो हर ढाबे में पंजाबी खाने के साथ chinese भोजन का मिलना जरुरी सा है
दूरदराज समुद्र के किनारे बने दक्षिण भारतीय होटलों में भी पंजाबी-chinese लिखा होता है
लेकिन ठीक बंगलोर के बीचो बीच बिहारी खाने का विज्ञापन करता 'चिली पेपर ' नई हवा का अहसास कराता है
मर्थाल्ली रिंग रोड पर मल्गुदी होटल के पास इस होटल की खूबियाँ अनेकों है
हफ्ते में तीन दिन यहाँ लिट्टी चोखा ,सत्तू पराठा और मकुनी मिलती है
लिट्टी में हरी मिर्चियां , लहसुन , सरसों का तेल , जीरा मिलाते हैं चोखा उबले आलू , बैंगन और टमाटर का मिलता है
सत्तू में पानी के साथ अदरक,जीरा मिलाकर पीने को भी मिलता है लिट्टी कोएले पर पकती है ,चाहें तो मटन/चिकन करी के साथ खाएं
अचरज की बात यह है कि इसके मालिक धरमराज मलयाली हैं
बोकारो में बचपन बीता, मैसूर में पढे पर बिहार के भोजन का स्वाद नहीं भुला पाये
स्टील के व्यापार के साथ इस दिशा में भी कदम बढाये शुरू शुरू में बहुत घाटा हुआ
होटल के किराये और खर्चे की लागत भी नही निकलती थी
पर बंगलोर की दो लाख से ज्यादा up/बिहार के जन मानस की आशा में टिके रहे
मेहनत रंग लायी और सप्ताहांत में होटल भरा रहता है
राजधानी एक्सप्रेस की शक्ल में बनी खिलौना ट्रेन खाना गर्म करने और सर्व करने के काम आती है मेनू में ६५० से ज्यादा व्यंजन लिखें हैं
हमने गोली कबाब ,पांच सब्जियों से बनी veg ginger से शुरुआत की
तले हुए कबाब के साथ मसाला पेप्सी अजब ही स्वाद देता है
काली दाल ,सब्जी अकबरी और नरगिसी कोफ्ते किसी भी अच्छे रेस्तौरांत को मात दे सकते थे
अनानास का रायता थोडी पीली रंगत लिए था
पेट इतना भर गया था कि गर्मागर्म जलेबी छोड़नी पड़ी
दिन के वक्त दाल बाटी चोखा नहीं मिलता है
इसका अफ़सोस रहा पर उम्मीद पर दुनिया कायम है
अगली बार सही
जबसे यह ब्लॉग शुरू किया है पुराने मित्रों से फिर से खतो किताबत शुरू हो गई है '' धन्य हैं महाराज , साइनाथ साहब सरकारी बदचलनी के बारे में लिख रहें है और आपको इस सड़ी गरमी में मूली का पराठा सूझ रहा है''जनाब हम तो आपको पढने लिखने वाला बन्दा समझते थे ,आप तो रसोइए निकले''''आपको मोटे लेंस वाले चश्मे से e.p.w. और seminar पढ़ते देखा था ,क्या पता था कि अब आप कुक बुक लिखने लगेंगे"'' अर्थशास्त्र और सांख्यकी पढने के बाद अमरीकी बाजारवाद का भंडाफोड़ करना चाहिए था ,आप तो सुपरमार्केट में डोसा खरीदने लगे".और आखिर में '' हम तो सोचते थे कि आप अरुन्धती राय की तर्ज़ पर नव साम्राज्यवाद के बारे में लिखेंगे , पर आप तो तरला दलाल निकले.''
मैं नतमस्तक हूँ , पर हुजूर एक छोटी सी कहानी सुन लीजिये
बहुत पुरानी बात भी नही है.पिछले दशक का ही कोई साल था
दफ्तर से एक शाम पत्र मिला कि आप को infantry रोड पर g-2 मकान छः महीने के लिए alott किया जाता है अतः no.g-14 तुरन्त खाली कर दें. लगा दुनिया की सबसे बड़ी नेमत मिल गई है. नया मकान ground floor पर था,एक बेडरुम ,किचन बाथरूम उस के साथ एक छोटी सी बैठक भी जुड़ी थी
शादी के बाद एक साल से हम लोग दूसरे माले पर एक कमरे (g-14) के निवास में रह रहे थे,जिसके बीच में परदा खींच कर थोडी ओट सी कर ली गई थी.
उस एक कमरे मे ही सारी गृहस्थी थी, दो सिंगल बेड को जोड़ कर बिस्तर बना लिया गया था,दो बेंत की कुर्सिया थीं जो बहु काजी थीं
रसोइं में किताबें भरी थी , गैस की लम्बी वेटिंग लिस्ट थी
पुरानी किताबों ,पत्रिकायों के अलावा जब श्यामल नारायण रिज़र्व बैंक की नौकरी को छोड़ इलाहाबाद वकालत करने चले गए तो सिविल सर्विस की तैयारी की अपनी सारी पुस्तकें छोड़ गए थे.
हाल यह था कि उस कमरें में कभी कोई पुराना मित्र / परिचित आ जाए तो हम दोनों को जल्दी से अधखाई थाली खाट के नीचे सरकानी पड़ती थी.
ऐसा नही था कि बाहर मकान नहीं खोजे पर वे हमारी पहुँच के बाहर थे
आसपास छोटे से दो बेडरूम के फ्लैट भी २५०० से काम किराये पर नही मिलते .
साथ मे दस महीने का किराया अडवांस मांगते थे.
२५००० रुपये नव दम्पति के हैसियत के बाहर थे
दफ्तर से 600-700 रुपये मकान किराये के भत्ते के नाम पर मिलता था
दूर जाना सम्भव नही था
अपने पास स्कूटर तो दूर साइकिल भी नहीं थी.
तो नया मकान (छः महीने के लिए ही सही) सौगात से कम नहीं था.
दफ्तर से लौटते ही पति पत्नी ने सोचा कि कौन दूर जाना है ,दो मंजिल और 30 सीढियों की ही तो बात है , सामन आज ही नए माकन में shift कर लेंते हैं
कपड़े बर्तन भांडे समेटे ,चादरों में गत्त्थर बांधे और सीढियों के रस्ते नए घर में उतरने लगे
शुरू में उत्साह था ,चार पाँच चक्कर तो लगा लिए ,लेकिन जब किताबों की बारी आई तो हिम्मत जवाब देने लगी. किताबें इतनी भारी होंगी ऐसा सोचा नही था पता नही पुराने दिनों में बौद्ध भिख्शु कैसे पोथियां ढोकर भारत से चीन ले गए होंगे लेकिन किताबों को छोड़ा भी नही जा सकता था ,रोते गाते किसी तरह दसियों चक्कर सींढिंयोँ पर ऊपर नीचे कर सारी किताबें नए मकान में पहुँचा हीं दी
लेकिन हम दोनों बुरी तरह थक गए थे , टांगे जवाब दे रहीं थी हाथ उठते नही थे
सुरमई शाम ढल चुकी थी , थोडी देर तो दोनों लोग औंधे पड़े रहे पर थोड़ा आराम मिलने पर भूख भी लगने लगी .घर में सामान चारों और बेतरतीब फैला था
जहाँ तक खाना बनाने का सवाल था , दोनों ही नौसिखिये थे
muir होस्टल की मेस जब बंद होती थी तो आलोक सिंह और मैं सोया के नुट्री नुगेट डाल कर तहरी नुमा पुलाव बना लेते थे था. चीनी (सुधीर गुप्ता) मैगी में अंडा डाल कर कुछ fried noodle जैसा बना leta था. विमल और प्रमोद के डेरे पर खिचडी एक दो बार बनाईं थी.
यही हाल पत्नी का भी था. होस्टल में पढी थीं .Mphil की पढ़ाई के साथ खाना बनाने की नौबत नही आई थी, सो अब क्या करें .
गृहलक्ष्मी ने सुझाव दिया कि बाजू में शंबाघ होटल है , दस बजने वाले हैं, देखो कुछ भोजन शायद मिल जाए. यह प्रक्टिकल सलाह थी . बंगलोर के होटलों में पन्द्रह बीस रुपये में भर पेट स्वादिष्ट खाना मिल जाता था.
पर होटल की ओर कदम नहीं उठे . दिल में एक फाँस लगी थी. हुआ यह था कि एक दिन m.g.रोड पर भटकते हुए पुरानी पत्रिकायों के स्टाल में विदेशी 'good housekeeping' की एक प्रति 5 रुपये में हाथ लग गई थी . निगाहें रेसिपे सेक्शन में एक डिश पर अटक गयीं थीं . इसमे उबले अण्डों का प्रयोग किया गया था .नाम था 'Devilled eggs'
पता नही कौन सी घड़ी थी
बदन थका था पर दिल काम कर रहा था. बजाय होटल जाने के कदम किचन में घुस गए .चारों ओर बिखरे कोहराम को भूल कर अंडे उबालने को रखे.
शादी में एक ओवेन मिला था ,बड़ा गोलमटोल almunium का ढांचा ,जिसमे केक बन सकता था. उसको बिखरे सामान में से खोज कर ओन किया और ''Devilled eggs'' बनाये .
पत्नी थक कर भूख प्यास भूल कर सो चुकीं थीं .
उनको जगाया और तश्तरी में ''Devilled eggs'' पेश किए
उन्हें पहले तो विश्वास नही हुआ,
फिर माथा पीट कर बोलीं 'धन्य हो भोजन भट्ट'